कुष्मांड विनायक जी — विघ्नहर्ता गणपति का वह स्वरूप, जिनके नाम में ही अन्नपूर्णता का आशीर्वाद है। 'कूष्माण्ड' (कुम्हड़ा/पेठा) भारतीय पूजा परंपरा में सात्विक बलि और अर्पण का प्रतीक फल है, और 'विनायक' का अर्थ है — विशिष्ट नायक, जो बिना किसी के नेतृत्व के स्वयं मार्ग बनाता है।
गणेश पुराण और शिव पुराण विनायक के अनेक क्षेत्रीय स्वरूपों का वर्णन करते हैं — हर क्षेत्र में गणपति एक विशिष्ट नाम और विशिष्ट फल-प्रसाद के साथ पूजे जाते हैं। काशी क्षेत्र की परंपरा में छप्पन विनायकों की गणना है, जो नगर और उसके आसपास के क्षेत्रों की रक्षा-परिक्रमा करते हैं। विनायक की स्थापना ग्राम और क्षेत्र की सीमा पर विघ्नों को रोकने वाले द्वारपाल के रूप में करने की यह परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
गणपति 'आदिपूज्य' हैं — कोई भी शुभ कार्य उनके स्मरण के बिना प्रारंभ नहीं होता। उनका गजमुख विवेक की विशालता का, छोटी आँखें एकाग्रता की सूक्ष्मता का, और बड़े कान अधिक सुनने-कम बोलने का संदेश देते हैं। कुष्मांड विनायक की उपासना विशेष रूप से गृहस्थों के लिए फलदायी मानी जाती है — घर की सुख-शांति और अन्न-समृद्धि के लिए।
बुधवार और चतुर्थी तिथि गणपति-आराधना के दिन हैं; संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है। दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प प्रिय अर्पण हैं। मंत्र: "वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥"