पोलिश्वरी देवी इस क्षेत्र की ग्राम देवी हैं — वह मातृशक्ति जो गाँव की सीमा, उसके जन, पशु और खेत-खलिहान की रक्षा करती है। भारतीय ग्राम-जीवन में ग्राम देवी की उपासना उतनी ही प्राचीन है जितने गाँव स्वयं।
शास्त्रों में जिन सप्त मातृकाओं और ग्राम्य देवताओं का उल्लेख है, उनकी जीवित परंपरा आज भी हर गाँव की अपनी देवी के रूप में चलती है। ग्राम देवी को गाँव की 'प्रथम माता' माना जाता है — विवाह हो, संतान का जन्म हो, नई फसल हो या कोई भी शुभ कार्य — पहला निमंत्रण, पहला प्रसाद देवी के थान पर ही चढ़ता है। यह परंपरा वेदों की उस दृष्टि का ही लोक-रूप है जो भूमि को माता कहती है: "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" (अथर्ववेद)।
ग्राम देवी की उपासना सिखाती है कि देवत्व केवल बड़े तीर्थों में नहीं — अपनी मिट्टी, अपने जल, अपने परिवेश में भी है। जो अपनी भूमि और अपने समाज के प्रति कृतज्ञ रहता है, देवी उसके परिवार पर सदा प्रसन्न रहती हैं। पोलिश्वरी देवी स्थानीय आस्था में संकट के समय स्मरण की जाने वाली तत्काल फल देने वाली माता मानी जाती हैं।
देवी के थान पर सोमवार और शुक्रवार को जल, अक्षत, सिंदूर और लाल चुनरी अर्पित करने की लोक-परंपरा है। नवरात्रि में विशेष पूजा और मनौती पूर्ण होने पर प्रसाद चढ़ाने का विधान चला आता है। देवी का स्मरण किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में क्षेत्र-रक्षा की प्रार्थना के साथ किया जाता है।