हनुमान जी

मालिहवीरबाबा मंदिर

हनुमान जी भक्ति की पराकाष्ठा हैं — ऐसा सेवक जिसने अपने स्वामी की सेवा को ही अपना संपूर्ण अस्तित्व बना लिया। भारतीय भक्ति परंपरा में 'दास्य भाव' का जो सर्वोच्च आदर्श है, वह हनुमान जी में साकार होता है।

पौराणिक कथा

सुंदरकांड इसका साक्षी है। सौ योजन का समुद्र, जिसे पार करना असंभव माना गया, हनुमान जी ने श्रीराम का नाम लेकर एक छलांग में पार कर लिया। लंका में सीता माता की खोज, अशोक वाटिका में उन्हें श्रीराम की मुद्रिका देना और लौटकर 'देखी सीता' का संदेश — यह प्रसंग बताता है कि सच्चे समर्पण के आगे कोई बाधा टिकती नहीं। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं: "राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम" — स्वामी का कार्य पूर्ण किए बिना विश्राम कैसा?

आध्यात्मिक महत्व

हनुमान जी की उपासना का मर्म है — शक्ति और विनम्रता का संगम। वे अष्ट सिद्धियों के स्वामी होकर भी स्वयं को केवल 'रामदूत' कहते हैं। साधक के लिए संदेश स्पष्ट है: सामर्थ्य जितना बढ़े, अहंकार उतना ही घटे। इसीलिए हनुमान-भक्ति को अहंकार-नाश की साधना भी कहा गया है।

उपासना विधि

मंगलवार और शनिवार हनुमान जी की आराधना के दिन हैं। सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करने तथा हनुमान चालीसा और सुंदरकांड के पाठ की परंपरा है। हनुमान जयंती (चैत्र पूर्णिमा) विशेष पर्व है। मंत्र: ॐ श्री हनुमते नमः।

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