शनि देव न्याय के देवता हैं — सूर्यपुत्र, छाया के नंदन, और नवग्रहों में कर्मफल के अधिष्ठाता। लोक में उनका नाम भय से लिया जाता है, पर शास्त्र उन्हें 'पक्षपातरहित न्यायाधीश' कहते हैं: वे न किसी के मित्र हैं, न शत्रु — केवल कर्म का लेखा देखते हैं।
पुराणों के अनुसार शनि देव सूर्य देव और छाया के पुत्र हैं। कठोर तप से उन्होंने ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान पाया। कथा है कि उनकी दृष्टि जिस पर पड़े, उसे अपने संचित कर्मों का हिसाब देना ही पड़ता है — राजा हरिश्चंद्र से लेकर राजा विक्रमादित्य तक की कथाएँ यही बताती हैं कि शनि की साढ़ेसाती सोना तपाने वाली अग्नि है: जो खरा है, वह और निखर जाता है।
शनि-उपासना वास्तव में कर्म-सुधार की साधना है। वे धैर्य, अनुशासन, परिश्रम और सेवा के कारक हैं। शनि देव उन पर सदय रहते हैं जो श्रमिकों, वंचितों और असहायों के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार करते हैं — यही उनकी प्रसन्नता का वास्तविक उपाय है, केवल तेल चढ़ाना नहीं।
शनिवार शनि देव का दिन है। सरसों के तेल का दीपक, काले तिल और उड़द अर्पित करने की परंपरा है। शनि ध्यान का प्रसिद्ध श्लोक है: "नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥" मंत्र: ॐ शं शनैश्चराय नमः।