शिव जी

राधा कृष्ण मंदिर

राधा कृष्ण के धाम में शिव जी — इस संगम की साक्षी स्वयं वृंदावन की भूमि है, जहाँ महादेव 'गोपेश्वर महादेव' के रूप में आज भी विराजते हैं। शिव कृष्ण-लीला के सबसे बड़े रसिक माने गए हैं।

पौराणिक कथा

गर्ग संहिता की प्रसिद्ध कथा है — जब वृंदावन में महारास हुआ, तो महादेव भी उसके दर्शन को व्याकुल हो उठे। पर रास-मंडल में पुरुष का प्रवेश निषिद्ध था — एकमात्र पुरुष कृष्ण। तब शिव जी ने यमुना में स्नान कर गोपी-रूप धारण किया और 'गोपेश्वर' बनकर रास के साक्षी बने। यह कथा भक्ति का गूढ़ रहस्य खोलती है: परमात्मा के प्रेम-राज्य में अहंता (पुरुष-भाव) लेकर प्रवेश नहीं होता — वहाँ सब जीव गोपी हैं, प्रियतम एक कृष्ण।

आध्यात्मिक महत्व

कृष्ण-धाम में शिव-उपासना हरि-हर अभेद की साधना है। शिव विष्णु के हृदय में और विष्णु शिव के हृदय में वास करते हैं — पुराणों का यह वचन संप्रदाय-भेद से ऊपर उठने की शिक्षा है। ज्ञान (शिव) और प्रेम (कृष्ण) मिलकर ही साधना पूर्ण होती है: ज्ञान बिना प्रेम अंधा है, प्रेम बिना ज्ञान रूखा।

उपासना विधि

सोमवार को जलाभिषेक-बेलपत्र की शैव परंपरा यहाँ कृष्ण-भक्ति के रंग में चलती है — अभिषेक के समय राधा-नाम संकीर्तन भी गूँजता है। श्रावण और महाशिवरात्रि प्रमुख अवसर हैं; हरियाली तीज पर शिव-गौरी और राधा-कृष्ण दोनों युगलों की संयुक्त झाँकी की लोक-परंपरा है। मंत्र: ॐ नमः शिवाय, संग में — राधे राधे।

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