हनुमान जी

रामेष्ठ मंदिर

'रामेष्ठ' का अर्थ है — जो राम को प्रिय है; और राम को हनुमान से प्रिय कौन? स्वयं श्रीराम ने कहा है कि मैं हनुमान से कभी उऋण नहीं हो सकता। राम के धाम में हनुमान की उपस्थिति उतनी ही स्वाभाविक है जितनी कथा में श्रोता की।

पौराणिक कथा

मान्यता है कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं — आठ अमर विभूतियों में से एक — और जहाँ-जहाँ राम-कथा होती है, वहाँ वे किसी न किसी रूप में उपस्थित रहते हैं: "यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।" रामायण के अंत में जब श्रीराम ने सबको विदा दी, हनुमान जी ने वर माँगा — जब तक पृथ्वी पर राम-नाम रहे, मैं रहूँ। सीता माता ने आशीर्वाद दिया कि हनुमान अजर-अमर रहेंगे। इसीलिए रामकथा-स्थलों पर हनुमान जी का आसन सदा आरक्षित माना जाता है।

आध्यात्मिक महत्व

राम-मंदिर में हनुमान-दर्शन का क्रम ही साधना का सूत्र है: पहले हनुमान, फिर राम — क्योंकि राम तक पहुँचने का द्वार हनुमान हैं। तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका राम तक पहुँचाने का माध्यम हनुमान जी को ही बनाया। भक्ति परंपरा कहती है: राम कृपा करें, इसके लिए पहले उनके प्रिय की कृपा चाहिए।

उपासना विधि

राम-दरबार के साथ हनुमान-पूजन में रामनाम-जप सर्वोपरि है — हनुमान जी को सबसे प्रिय भेंट राम-नाम ही है। मंगलवार को सुंदरकांड पाठ और रामनवमी व हनुमान जयंती के पर्व यहाँ विशेष महत्व रखते हैं। मंत्र: "राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे" — हनुमान चालीसा का यह स्मरण ही यहाँ की साधना का सार है।

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