राम के मंदिर में शंकर जी — यह भारतीय भक्ति की सबसे सुंदर परस्परता है: राम शिव के आराध्य, और शिव राम के। रामचरितमानस में स्वयं शिव पार्वती को राम-कथा सुनाते हैं — पूरा मानस ही शिव-मुख से निकली रामकथा है।
लंका-विजय से पूर्व श्रीराम ने समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना कर महादेव की पूजा की — वही स्थान आज रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग है, जिसका अर्थ ही है: राम के ईश्वर। दूसरी ओर शिव जी सदा राम-नाम के जप में लीन रहते हैं; मानस में वे कहते हैं कि एक 'राम' नाम सहस्र नामों के बराबर है। यह अन्योन्य भक्ति सिखाती है कि सच्ची महानता दूसरे को पूजने में संकोच नहीं करती।
राम-परिसर में शंकर-उपासना हरि-हर एकता की साधना है। मानस की प्रसिद्ध घोषणा है: "शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा" — श्रीराम स्वयं कहते हैं कि शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी नहीं पा सकता। अर्थात राम-भक्ति की पहली शर्त शिव-प्रेम है। जो दोनों को एक देखता है, वही दोनों की कृपा पाता है।
सोमवार को जलाभिषेक और बेलपत्र के साथ यहाँ 'ॐ नमः शिवाय' के संग राम-नाम जप की दुहरी परंपरा है। श्रावण मास और महाशिवरात्रि विशेष पर्व हैं। रामेश्वरम की स्मृति में राम-स्थापित शिव के दर्शन का पुण्य यहाँ स्मरण किया जाता है। ध्यान श्लोक: "कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।"